14/10/2025.कक्षा के बाहर बंधे शिक्षक”
(शिक्षकों के मन की बात)
कागज़ों के ढेरों में गुम हो गई किताबें,
फाइलों की लहरों में डूब गई ख्वाबें।
जो हाथ कभी चॉक से सपने लिखते थे,
अब हस्ताक्षर की दौड़ में थकते हैं।
रजिस्टर, सर्वे, रिपोर्ट की लड़ी,
शिक्षा कहाँ, अब गिनती पड़ी।
कक्षा पुकारे, “गुरुजी आइए”,
पर आदेश कहे, “पहले ड्यूटी निभाइए”।
गाँव के आँकड़े, जनगणना का मेला,
टीकाकरण, सर्वे — सब झोला ढोने वाला।
बच्चों के गीत, अब फाइलों में खोए,
शिक्षक भी सरकारी बोझ में रोए।
ना समय कहानी का, ना कविता सुनाने का,
ना उत्सव बच्चों संग मुस्कराने का।
शिक्षा से बढ़कर कागज़ी नाम,
शिक्षक बन गए “सिस्टम के गुलाम”।
फिर भी उम्मीद का दीप जलाए,
हर कार्य में ईमानदारी निभाए।
क्योंकि जानता है, अगर शिक्षक रुके,
तो भविष्य के सूरज भी धुंधले पड़े।
नन्द किशोर सतपथी
प्रधान पाठक






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